पोरा (पोला) तिहार – कृषि और गृहस्थी का संस्कार, इस दिन श्री कृष्ण ने कंस के भेजे हुए पोलासुर नामक राक्षस का वध भी किया था

हमारे सभी त्यौहार मूलतः प्रकृति के प्रति कृतज्ञता और उसके उत्सव से सम्बंधित होते हैं। इसी क्रम में इस वर्ष आज पोला तिहार मनाया जा रहा है। भादो अमावस्या को पड़ने वाले पोला को हमारे यहाँ छत्तीसगढ़ में पोरा कहते हैं। इसमें कृषक अपने पशुधन को सजाते हैं, संवारते हैं, सेवा करते हैं। उनके प्रति स्नेह का यह रूप प्राकृतिक सहअस्तित्व को समझने का उदाहरण है।

आज गाँवों-कस्बों में बैलों की दौड़ का भी आयोजन होगा। इधर रसोई में माई-बहिनी मन जो तीजा के अवसर पर अभी से मईके में हैं, बरा, भजिया, चौसला, बोबरा, ठेठरी, खुर्मी व्यंजन छान रही हैं। माता-पिता के घर उनकी मुस्कान देखते ही बनती है।

कृषि और गृहस्थी का परंपरागत संस्कार बच्चों में इसी त्यौहार से डाला जाता है। लड़के मिटटी के ‘नांदिया बइला’ (बैल) तीरेंगे और लड़कियां ‘दीया-चुकी’ से खेलेंगी। मेरी माताजी कल ही खरीदे दीया – चुकी, जांता आदि निकाल रही हैं ताकि उनकी पोती उनसे खेल सके। एक चित्र में बाजार में नए बैलों का सिंगार करता बालक दिख रहा है। वह आज स्कूल नहीं गया है पर यहाँ एक दिन बैठकर जरूर लोक का संरक्षण कर रहा है। एक और तस्वीर में बइला के गोड़ में चक्का लगाया जा रहा… तीसरे चित्र मे जांता को माहुर रंग में रंगा जा रहा है। संस्कृति का यह रंग बना रहे, यही कामना है।

बैल, धरती और अन्न को सम्मान देने का पर्व

 

बैल, धरती और अन्न को सम्मान देने के लिए पर्व मनाया जाता है। इसके लिए किसान बैलों की पूजा करते हैं। घरों में बच्चे मिट्टी से बने नंदी बैल और बर्तनों के खिलौनों से खेलते हैं। घरों में ठेठरी, खुरमी, गुड़-चीला, गुलगुल भजिया जैसे पकवान तैयार किए जाते हैं। गुड़हा, चीला, अनरसा, सोहारी, चौसेला, ठेठरी, खुरमी, बरा, मुरकू, भजिया, मूठिया, गुजिया, तसमई छत्तीसगढ़ी व्यंजनों का भोग लगाया जाएगा।

किसान गौ माता और बैलों को स्नान कराकर श्रृंगार करेंगे। सींग और खुर यानी पैरों में माहुर, नेल पॉलिश लगाएंगे, गले में घुंघरू, घंटी, कौड़ी के आभूषण पहनाकर पूजा करेंगे। मान्यता है कि भगवान कृष्ण के बाल्यकाल में कंस ने कई असुरों को उन्हें मारने भेजा था। एक बार कंस ने पोलासुर नामक राक्षस को भेजा, जिसे भी कृष्ण ने मार दिया था। वह दिन भाद्रपद अमावस्या का था इसलिए इसे पोला कहा जाता है।

इधर व्यापक रूप में जब हम किसानो, खेतिहरों की समकालीन स्थिति देखते है तो अत्यंत पीड़ा होती है कि तीव्र और अस्वाभाविक विकास, बाज़ारवाद, पूंजीवाद ने किस तरह से धरतीपुत्र की खुशियों को ग्रस लिया है। क्या प्रेमचंद के ‘हीरा-मोती’ फंदों पर लटकते किसानो को रोक पाएँगे ? क्या कृषक माताओं-बहनों की नियति धनिया की तरह एकाकी रह जाना है ? देश और समाज इन दोनों स्थितियों को सुधार ले, संभाल ले तो हर त्यौहार खुशियों से भरपूर रहे।

किसान बैलों के साथ होते है प्रतियोगिता में शामिल

इस दिन आसपास के गांवों से बैलों का श्रृंगार कर किसान अपने साथ लाते है। इस दौरान बैल दौड़ प्रतियोगिता होती है। इसे देखने के लिए हजारों लोगों की भीड़ जुटती है। बैलों की पूजा के बाद बच्चे मिट्टी के बैल दौड़ाएंगे। बाजारों में मिट्टी के बैल कई दिन पहले से बिकने शुरू हो जाते है।

बहरहाल, त्यौहार मानव जीवन का उत्स है। उसे प्रकृति ने यह अधिकार दिया है। प्रकृति के प्रति कृतज्ञ बनें, सदय बनें। आप सभी को पोला की बधाइयां और शुभकामनाएँ। इस अवसर पर फेसबुक में ही एक मौलिक गीत मिला है, जिसे सोनू नेताम, रुद्री नवागांव (धमतरी) ने लिखा है। उनका धन्यवाद…

पोरा तिहार मनाबो

हमर परब पोरा चुकि तिहार
नांदिया बईला ल संम्हराबो
बांस कमचिल काड़ी म
सिलि चक्का ल बनाबो

बरा सोंहारी ठेठरी खुरमी
नांदिया पोरा जाता म चघाबो
देवी देवता ल हुम धुप देके
पोरा तिहार ल मनाबो

माटी के बईला बनाके
पुजा पाठ ल कराबो
पोटरी बांधके रोटी पिठा ल
बईला के पीठ म बांधबो

बईला दउंड़ के खेल म
नांदिया बईला ल दउंड़ाबो
सिंग टुटे चाहे सिलि चक्का
दउंड़ म हम सबला हराबो

संगी संगवारी सन रेंधिक रेंधा
दउंड़के सबले हम अघुवाबो
सुग्हर ए हमर पोरा तिहार
जुर मिलके सबो मनाबो !!

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